Monday, February 1, 2010

एक सपने का सच

आज बहुत दिनों के बाद कुछ लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। पिछले कई महीनो से शहर , देश , नौकरी सब कुछ बदल गए। उसी बदलाव को संभालते हुए इतने दिन बीत गए। आज कुछ नया लिख रहा हूँ....देखिएगा....

उचकते हुए कुछ सपनो ने
कोशिश की है देखने की
नींद की दीवार के उस पार
उन्होंने उस पार के बहुत किस्से सुने हैं
और उन किस्सों के ताने-बाने से
अपने लिए कई सपने बुने हैं
नींद के उस पार जो जादू भरा देश है
जिसमे अंधेरों के उजाले हैं
उस अँधेरे-उजाले के रंगीन जादू को
करना चाहता है अपना
उचकता हुआ हर नया सपना
ताकि वो भी किसी आंख में रम जाएँ
सपने भर के लिए ही सही
समय इस माया में थम जाए
पल भर के लिए वो सपना सब कुछ बन जाए
और पल टूटते ही
किसी कठोर सच की बलिवेदी पर चढ़ जाए



Wednesday, July 8, 2009

क्यों लालगढ़...

हाल ही में पश्चिम बंगाल के लालगढ़ में हुई हिंसा पर बहुत चर्चा हुई। पुलिस एक्शन से लालगढ़ को मओवादियों से मुक्त भी कराया गया। पर भयावह बात ये है की अराजक तत्वों को लोगो का साथ मिला। कुछ हद तक एक जन आन्दोलन सा बना जो बाद में उग्र और हिंसात्मक होता गया और उसका फायदा तथाकथित मोविद्यो ने उठाया। विचारणीय है की क्या हम और हमारी व्यवस्था प्रणाली इंडिया में बैठकर भारत की समस्याओं को अनदेखा कर रहे हैं और क्या भारत अब इसी अनदेखी से नाराज़ होकर अपनी नाराजगी को ज़ाहिर करने के तरीके खोज रहा है?

उत्तर शायद इतने सरल नही...पर उत्तर की खोज का पहला पड़ाव है प्रश्न पूछना। ये रचना इन्ही प्रश्नों को उकसाने का एक प्रयास मात्र है.......


कई हाथ उठे, कई आवाजें
कई बरछी, बल्लम, भाले
कुछ सिसकियाँ जो ग्रंथो के शून्यो में खो गयी
कुछ हूक जो संख्याओं के अंधेरे में सो गयी
ऐसे ही गिरते, उठते , खोते, सिसकते
घिसते, पिसते, उंघते ,ठिठकते
पलों ने अपनी आखिरी बगावत की थी
आज लालगढ़ की लाल मिटटी नें
अपनी सोई प्रथाओं से अदावत की थी

भारी बूट चले
रौंदने इस उन्माद को
बयोनेट की नोक से
रोकने इस विवाद को
चर्चा, गोष्ठी और विचार मंथन
उनमे उठे कई कम्पन
कैसे हो इसका दमन
प्रेम से या बल से
या फिर किसी राजनैतिक छल से
कैसे भी हो, होना चाहिए
लालगढ़ जो जागने को आतुर है
उसे फिर से सोना चाहिए
पर....

कोई ये नही पूछता
क्यों इस मिटटी ने लहू का स्वाद चखना चाहा है
बस यही तो बूझना था....
इस मिटटी नें आखिरी बार कब भरपेट खाना खाया है !!

Friday, December 26, 2008

पिंजरों का दर्द

पिंजरों के भी जज़्बात होते हैं

वो भी परिंदों के लिए रोते हैं

बस परिंदों के शोर में कहीं

अपनी दबी आवाज़ खो देते हैं

किसी का आशियाँ कहला सकें

इसलिए कितना जतन करते हैं

पर परिंदे हैं कि हर वक़्त उसे

अपना कहने से मुकरते हैं

कभी कभी हताश गुस्से में

शिकायत भी करते होंगे

फिर अपनी शिकायतों का क़र्ज़

अपने ही दर्द से भरते होंगे

हर जतन करते हैं ये

कभी हँसते, कभी रोते, कभी जिंदगी के गीत गाते हैं

अब कैसे समझाऊँ मैं इनको

ये क्यों कभी आसमान नही बन पाते हैं

Saturday, November 29, 2008

आतंक के साये में...

पिछले तीन दिनों से लगातार टेलिविज़न पर मुंबई में चल रही कार्यवाही देख रहा हूँ। देश से दूर बैठा हुआ सिर्फ़ किसी तरह से मन की दुश्चिंता को मिटाने की कोशिश कर रहा हूँ। मुंबई में रहने वाले अपने मित्रो से उनकी खैर ख़बर जानकर आश्वस्त हो रहा हूँ की इस बार हताहत में मेरा कोई परिचित नही है, इस बार मुझे सिर्फ़ सांत्वना देनी है, इस बार मेरी रोने की बारी नही।

मगर कब तक.....? कितने दिनों भाग्य के साथ आँख मिचौली चलेगी? मृत्यु से कई गुणा भयानक मृत्यु के आतंक के साये में कब तक अपनी सहिष्णुता, सहनशीलता, विवेक को कायम रख पायेगा ये समाज? अविश्वास के राज्य में कितने प्रतिबन्ध लगाकर हम स्वयं को सुरक्षित कर पायेंगे? और इस सुरक्षा का मोल इन प्रतिबंधो से नही बल्कि इन प्रतिबंधो से आहत व्यक्तिगत स्वाधीनता से चुकायेंगे।

बोध शक्ति को सुन्न करने वाली इन घटनाओं के सम्मुखीन होते हुए भी शायद हमें सोचना पड़ेगा की हम आख़िर ये किसका मूल्य चुका रहे हैं? सत्तारूढ़ धृतराष्ट्रों के लोभ और महत्वाकाँक्षा के पाश में दम तोड़ती नीतियों का परिणाम हम भुगत रहे हैं। और सिर्फ़ यही नही....राजनीति के प्रति गहरी उदासीनता और उसे अकर्मण्य नपुंसकों के भरोसे रख देने का जो अपराध हमने किया है, उसका मूल्य भी हमें अपने रक्त से ही शायद चुकाना होगा।

Sunday, September 21, 2008

पहचान के दाम

कभी धर्म ,कभी समाज, कभी देश
कभी और कुछ नही

तो सिर्फ भाषा या वेश

जिसने भी दी कोई पहचान

मैं समझता था उसका अहसान
पर बाद मे ये भेद जाना
उनकी प्रखर बुद्धि को पहचाना
आसान किश्तों के लोन की तरह
ये पहचान की एक मुश्त रकम देते हैं
आपको पता भी नही चलता
कब आत्मा को गिरवी रख लेते हैं
अब वो रीति-नीति के नये प्रलोभन फेंकते हैं
उनमे हँसते और फँसते हुये हम

दुनिया अब दूसरे के चश्मे से देखते हैं

Saturday, September 6, 2008

अपनों सी धरती...

कई बार मन ये भी करता है

के चलते रहे

बिना रुके, बिना मुडे

और पहुँच जाएँ वहाँ

जहाँ ये धरती चुपके से सूरज को निगल जाती है

पर वो जगह बस नज़र आती है

हर बार पास आने पर

जाने क्यों क़दमों की गिरफ्त से फिसल जाती है

मैं हैरान होता हूँ

ये मानों किसी मनचले सपने सी हो गयी

पास, दूर और फिर पास लगना

मिलके हँसना

हँसकर बिछडना

धरती भी मेरे अपनों सी हो गयी

Thursday, August 7, 2008

मौत...एक लम्हे का बदलाव

दिन बीता, रात गयी, फिर नया दिन
कई दिनों से नीँद के इँतज़ार मे बैठी आँखें
आख़िर आज थककर सो गयीं
ख़्वाबों की टिमटिमाती दुनिया में
ये धधकती धडकती दुनिया खो गयी....

इस मखमली अँधेरे लम्हे से पहले
आखिरी बारकुछ साये से आये थे नज़र
जैसे कुछ बीते मौसम, कुछ साल, कुछ महीने
कुछ कहना भूल गये थे ताबा
लौटकर वही बताने आये थे

ठिठके, मुडे, रूके

सोचा, मुडे, चले
जो कहा नही तब भी

बताया नही अब भी

मगर उनके इसी ठिठकने मे पता चला

इन आँखों को
अब उनको भी खोने का सफर करना है

इन बीते वक़्त के टुकडो को लेकर साथ

किसी खाली ख्वाब को भरना है
बस फर्क सिर्फ इतना होगा
खाली से ख्वाब हक़ीक़त होंगे
भरी सी हक़ीक़त सपना होगा