Sunday, June 2, 2013

ek ghazal

दौर-ए -रहगुज़र ये  बदलता क्यों नही

शाम के साये में भी ढलता क्यों नही


हर आह में दर्द का ये सबब क्या है
दिल में जो जमा है वो पिघलता क्यों नही



हर  रंजिश वो सुनें ये ज़रूरी तो नही

पर  आँखों में ये कतरा  संभलता क्यों नही

 
खुशी भी अब रवायत सी हो गयी शायद

वरना बहार आने पर  जी मचलता क्यों नही



sapno kaa raag

सपनो का राग

सुनसान रात  में मालकौंस के कांपते कोमल स्वर की तरह
सुना है  तुम्हारे हर सपने कोहमने  हमने  ज़िन्दगी की तरह
पर सपने खामोशी की छाँव में पनपते हैं,  खुश रहते हैं
इसीलिए हम भी मन मसोस कर बस चुप रहते हैं
मन करता है तुम्हारे हर सपने को सहेज लूं अपनी आँखों में
और फिर कुछ कहने की ज़रुरत ही न रहे 
बस आँखों में खेलें अब जो हों हमारे सपने
होकर रहे जो  इतने अपने
एक तान से बंधे हुए सुर की तरह
आओ गायें इन सपनो को
अपने खामोश जीवन गीत की तरह

Monday, August 15, 2011

कुछ क्षण ये भी

आज फिर लिखने की कोशिश की है। पूरी कविता तो नहीं है पर कुछ क्षण छोटे छोटे बंधों में सामने रख रहा हूँ।

१। सूखे सपने .......
उतर आए हैं कुछ सपने आँखों में फिरसे
मांगते हैं छाँव थोड़ी सी
के भीग ना जाएँ बारिशों में
सूखे रहने की आदत हो चुकी है
जानते हो, उन्ही को पनाह देने के लिए
आज मेरी पलकें झुकी हैं

२ उमस
उमस भरी एक दोपहरी
करवटें बदलते हुए
सिलवटों सी टूटी आह भरती है
पर्दों से आती रौशनी से परेशान
शाम के अँधेरे का इंतज़ार करती है


नन्हा सा पल
किलकारियां भरता हुआ
पाँव हवा में मारता हुआ
किसी दिन की गोद में चढ़ना चाहता है
उस दिन के कंधो पर बैठकर
अपनी धुंधली आँखों से
अपने बड़े होने का किस्सा पढना चाहता है

Monday, February 1, 2010

एक सपने का सच

आज बहुत दिनों के बाद कुछ लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। पिछले कई महीनो से शहर , देश , नौकरी सब कुछ बदल गए। उसी बदलाव को संभालते हुए इतने दिन बीत गए। आज कुछ नया लिख रहा हूँ....देखिएगा....

उचकते हुए कुछ सपनो ने
कोशिश की है देखने की
नींद की दीवार के उस पार
उन्होंने उस पार के बहुत किस्से सुने हैं
और उन किस्सों के ताने-बाने से
अपने लिए कई सपने बुने हैं
नींद के उस पार जो जादू भरा देश है
जिसमे अंधेरों के उजाले हैं
उस अँधेरे-उजाले के रंगीन जादू को
करना चाहता है अपना
उचकता हुआ हर नया सपना
ताकि वो भी किसी आंख में रम जाएँ
सपने भर के लिए ही सही
समय इस माया में थम जाए
पल भर के लिए वो सपना सब कुछ बन जाए
और पल टूटते ही
किसी कठोर सच की बलिवेदी पर चढ़ जाए



Wednesday, July 8, 2009

क्यों लालगढ़...

हाल ही में पश्चिम बंगाल के लालगढ़ में हुई हिंसा पर बहुत चर्चा हुई। पुलिस एक्शन से लालगढ़ को मओवादियों से मुक्त भी कराया गया। पर भयावह बात ये है की अराजक तत्वों को लोगो का साथ मिला। कुछ हद तक एक जन आन्दोलन सा बना जो बाद में उग्र और हिंसात्मक होता गया और उसका फायदा तथाकथित मोविद्यो ने उठाया। विचारणीय है की क्या हम और हमारी व्यवस्था प्रणाली इंडिया में बैठकर भारत की समस्याओं को अनदेखा कर रहे हैं और क्या भारत अब इसी अनदेखी से नाराज़ होकर अपनी नाराजगी को ज़ाहिर करने के तरीके खोज रहा है?

उत्तर शायद इतने सरल नही...पर उत्तर की खोज का पहला पड़ाव है प्रश्न पूछना। ये रचना इन्ही प्रश्नों को उकसाने का एक प्रयास मात्र है.......


कई हाथ उठे, कई आवाजें
कई बरछी, बल्लम, भाले
कुछ सिसकियाँ जो ग्रंथो के शून्यो में खो गयी
कुछ हूक जो संख्याओं के अंधेरे में सो गयी
ऐसे ही गिरते, उठते , खोते, सिसकते
घिसते, पिसते, उंघते ,ठिठकते
पलों ने अपनी आखिरी बगावत की थी
आज लालगढ़ की लाल मिटटी नें
अपनी सोई प्रथाओं से अदावत की थी

भारी बूट चले
रौंदने इस उन्माद को
बयोनेट की नोक से
रोकने इस विवाद को
चर्चा, गोष्ठी और विचार मंथन
उनमे उठे कई कम्पन
कैसे हो इसका दमन
प्रेम से या बल से
या फिर किसी राजनैतिक छल से
कैसे भी हो, होना चाहिए
लालगढ़ जो जागने को आतुर है
उसे फिर से सोना चाहिए
पर....

कोई ये नही पूछता
क्यों इस मिटटी ने लहू का स्वाद चखना चाहा है
बस यही तो बूझना था....
इस मिटटी नें आखिरी बार कब भरपेट खाना खाया है !!

Friday, December 26, 2008

पिंजरों का दर्द

पिंजरों के भी जज़्बात होते हैं

वो भी परिंदों के लिए रोते हैं

बस परिंदों के शोर में कहीं

अपनी दबी आवाज़ खो देते हैं

किसी का आशियाँ कहला सकें

इसलिए कितना जतन करते हैं

पर परिंदे हैं कि हर वक़्त उसे

अपना कहने से मुकरते हैं

कभी कभी हताश गुस्से में

शिकायत भी करते होंगे

फिर अपनी शिकायतों का क़र्ज़

अपने ही दर्द से भरते होंगे

हर जतन करते हैं ये

कभी हँसते, कभी रोते, कभी जिंदगी के गीत गाते हैं

अब कैसे समझाऊँ मैं इनको

ये क्यों कभी आसमान नही बन पाते हैं

Saturday, November 29, 2008

आतंक के साये में...

पिछले तीन दिनों से लगातार टेलिविज़न पर मुंबई में चल रही कार्यवाही देख रहा हूँ। देश से दूर बैठा हुआ सिर्फ़ किसी तरह से मन की दुश्चिंता को मिटाने की कोशिश कर रहा हूँ। मुंबई में रहने वाले अपने मित्रो से उनकी खैर ख़बर जानकर आश्वस्त हो रहा हूँ की इस बार हताहत में मेरा कोई परिचित नही है, इस बार मुझे सिर्फ़ सांत्वना देनी है, इस बार मेरी रोने की बारी नही।

मगर कब तक.....? कितने दिनों भाग्य के साथ आँख मिचौली चलेगी? मृत्यु से कई गुणा भयानक मृत्यु के आतंक के साये में कब तक अपनी सहिष्णुता, सहनशीलता, विवेक को कायम रख पायेगा ये समाज? अविश्वास के राज्य में कितने प्रतिबन्ध लगाकर हम स्वयं को सुरक्षित कर पायेंगे? और इस सुरक्षा का मोल इन प्रतिबंधो से नही बल्कि इन प्रतिबंधो से आहत व्यक्तिगत स्वाधीनता से चुकायेंगे।

बोध शक्ति को सुन्न करने वाली इन घटनाओं के सम्मुखीन होते हुए भी शायद हमें सोचना पड़ेगा की हम आख़िर ये किसका मूल्य चुका रहे हैं? सत्तारूढ़ धृतराष्ट्रों के लोभ और महत्वाकाँक्षा के पाश में दम तोड़ती नीतियों का परिणाम हम भुगत रहे हैं। और सिर्फ़ यही नही....राजनीति के प्रति गहरी उदासीनता और उसे अकर्मण्य नपुंसकों के भरोसे रख देने का जो अपराध हमने किया है, उसका मूल्य भी हमें अपने रक्त से ही शायद चुकाना होगा।