Monday, September 24, 2007

मेरे लिए बस दीप

अगणित तारे इन हाथों मे न संभलेंगे
मेरे लिये बस छोटा सा दीप जलाओ
नभ सा विस्तार भला क्या दे पाऊँगा
चाहो तो इस मन मे ही सँसार बसाओ

तुमको मुक्त गगन मे ही उडना प्रिय था
मै भी शाखा के ममता से मुक्त नही था
तुम उडे पर मै अब भी हूँ आस मे बैठा
थककर शायद तुम इस शाखा पर आओ

तुमको भाया है सरिता सा बहते रहना
सागर मे मिलना उसकी ही बातें कहना
मैं तट बन इस आशा के साथ चला हूँ
कुछ बातें शायद मुझसे भी करते जाओ

नव बसन्त के पुष्पों को मै तोड न पाया
इसीलिये पतझड के पत्ते ओढ मै आया
पुष्पहार तो नही पर तुम छाँव जो चाहो
इन पत्तों से ही अपना पर्ण-कुटीर बनाओ

अगणित तारे मेरे हाथों मे न संभलेंगे
मेरे लिये बस छोटा सा दीप जलाओ

Sunday, September 23, 2007

ज़िन्दगी कि रेल

स्टेशन के बाहर खडा भिखारी
खोमचेवाला, कुली, मदारी
रिक्शे वाला भैया या गुमटी वाला पनवाडी
सब देखते हैं सपने
कि एक दिन उनकी गाडी पटरी पर आयेगी
फिर राजधानी की स्पीड से
उनको आगे ले जायेगी
और उस राजधानी कि उम्मीद में
रोज़ लोकल की भीड सा घिसते हैं
जीवन की पटरियों कि फिश-प्लेट मे फँसे
चुपचाप खडे पिसते हैं

प्लेटफार्म सा अपनापन
ये भी दिखलाते हैं
तभी तो हर आने-जाने वाले को
कभी चाचा, कभी भैया, कभी अम्मा बनाते हैं
बुलाते हैं ,दिखाते हैं
कराहते हैं ,सराहते हैं
कभी टहलाते कभी बनाते हैं...
फिर चुप हो जाते हैं
क्योंकि अगला किसी रिश्ते से मुकर जाता है
सामान नही लाता
पान नही खाता
आधे दाम वाली इम्पोर्टेड शर्ट पर नही ललचाता
तमाशा नही देखतापैसा नही फेंकता
रिक्शे से मुँह चुराकर
पैदल ही चला जाता है
ऐसे अर्थहीन रिश्ते को कौन भला निभाता है
ये भी नही निभाते हैं
आँख से ओझल और पुकार के बाहर चले बाने पर
कुछ किस्मत की तरह
एक भद्दी सी गाली से मन भरकर
किसी और पुख्ता रिश्ते की खोज मे लग जाते हैं

रात होती है
पनवाडी कि ढिबरी जलती है
कुली , खोमचेवाला, मदारी
रिक्शेवाला भैया और भिखारी
सब थककर सोने जाते हैं
और रात की पाली के कुली मदारी
खोमचेवाला, रिक्शेवाला और भिखारी आकर
अपनी राजधानी के सपने सजाते हैं
वो भी रिश्ते सजाते हैं
अऊटर सिग्नल पर खडी ज़िन्दगी के लिये
प्लेटफार्म पर अपनी पलकें बिछाते हैं

Friday, September 21, 2007

अब क्या कहें

शेष भाग

आज की इस परिस्थिति का उत्तरदायी आज का समाज है। समाज शब्द से हमारी व्यक्तिगत ग्लानि को छुपाने की कोशिश सी लगती है, इसीलिये स्पष्ट कर दूँ कि समाज मतलब हम सब। दूसरो के दुःख को बाज़ारोपयोगी वस्तु बनाने का श्रेय न्यूज़ चैनल को नही, हमारा है। हम आतुर रहते हैं ऎसी खबरों के लिए क्योंकी परोक्ष रुप से ये खबरें सभयता के लिबास मे छुपी इंसानी विकृतियों को उसका भोजन देती हैं।

हम सबको अच्छा लगता है कि कोई भयानक सी, कुत्सित सी खबर आये, जिस देखकर, सुनकर हमें मज़ा मिले और साथ ही हम दूर से उनपर दया भाव दिखाकर आत्म-गौरव महसूस कर सकें। हमारी इसी सामूहिक विकृत मानसिकता को भुनाते हुये ये न्यूज़ चैनल झूठी-सच्ची खबरों के साथ हमारे सामने आते हैं और हम इसको अपने सामान्य ज्ञान मे वृद्धि जानकार निगल जाते हैं.

Thursday, September 20, 2007

अब क्या कहें?

क्या कहें?

शेष भाग से आगे......

हमनें ये तो देख लिया कि कैसे हमारे पास खबरों के प्रसारण की सुविधा बहुतायत में है पर खबरें कम। प्रसारण की सुविधा कि जगह माध्यम कहना शायद ज़्यादा ठीक होगा। सुविधा इसलिये नही कह सकते क्योंकि सुविधा दिखती नही.....कई सुनामी आकर चले जाते हैं और तटीय इलाकों के मछुआरों को छोड़कर बाक़ी सबको पता चलता है सुनामी के आने के बारे में। इसीलिये कहा है कि माध्यम बहुत सारे हैं।

खैर, मुद्दा था खबरों कि कमी, तो उसी पर वापिस आते हैं। हर चैनल और कई अखबारों ने अपने संवाददाता
हर ओर तैनात रखे हैं और सबको आदेश यही है कि खबर दिखती है तो जनता को दिखाओ, नही है तो बनाकर दिखाओ। पहली स्थिति हम हर रोज़ देखते सुनते हैं, पर दूसरी स्थिति का भी दर्शन होता है। हाल ही में दिल्ली में हुये उमा खुराना काण्ड में कुछ ऐसा ही देखने को मिला। पहले पहल इस कहानी को समाज में जागरूकता लाने और व्याभिचार को सबके सामने लाने की चेष्टा के रुप में लाया गया। आशातीत फल भी मिला....लोगों के आक्रोश और आंदोलन के रुप में। एक खबर से दूसरी खबर का janma हुआ।

ये जन आंदोलन और स्कूली छात्राओं की khabar अपने आप मे ही काफी rochak हो गयी। यहाँ रोचक शब्द का प्रयोग काफी असंवेदनशील लगता है। बात चुभती तो है पर सच भी यही है। यहाँ स्त्री और यौन शोषण जैसा विषय था और लोगो को ऐसे विषय काफी जल्दी प्रभावित करते हैं। अगर बात ये होती की किसी छात्र को कोई बहुत बड़ी बीमारी है तो बस एक चोटी खबर होती, और वो आगे जन आंदोलन जैसी नयी खबरों को जन्म नही देती। खैर, वस्तुस्थिति ये रही की बनायी हुई खबर ने किस प्रकार देश, समाज और कानून को नचाया और हमने देखा की कैसे हम अफवाहों के दौर में रहते हैं।

तो अब ये भी पता चला की खबरों कि कमी के चलते कृत्रिम खबरें बनायी जा रही हैं, जिससे काफी नुकसान भी हो सकता है। तो प्रश्न ये है कि इसकी जिम्मेदारी कौन उठाएगा? क्या चैनल पर पूरा दायित्व देकर हम अपना हाथ झाड़ लें या फिर इसपर विचार करें की ये खबरे हमारे देश-काल-समाज का प्रतिबिम्ब हैं और इसलिये हम सब भी इसके लिए उत्तरदायी हैं?

क्रमशः..................

Wednesday, September 19, 2007

अब क्या कहें?

अद्भुत सी स्थिति दिखाई पड़ती है। खबरों के चैनल बहुतायत में होने के कारण खबरों का अकाल पड़ गया है। अकाल कि स्थिति मे मनुष्य जो मिले जैसा मिले वैसा ही भोजन कर लेटा है..आजकल खबरों की भी कुछ ऎसी ही स्थिति है। आप केवल कुछ अलग हटकर चलिए, तो आप खबर हैं। मज़े की बात ये है कि अगर आप बिल्कुल सीधे पथ पर भी चलते हैं, तो भी आप खबर हैं।

जब खाद्यान्न की कमी हुयी, तब मनुष्य ने कृत्रिम खाद्यो को खोजा। भोजन के सार तत्वों को लेकर आसानी से पचने वाली कैप्सूल बनाकर लोगो को दे दी गयी। आजकल खबरों की भी ऐसी ही अवस्था है। अब सोनिया जी हमेशा ही कोई नयी बात नही कर सकती (हालांकि इस पर भी शक है कि कर सकती भी हैं कि नही), आडवानी जी हमेशा रथ पर आरूढ़ होकर नही रह सकते, बाजपेयी जी वैसे ही योग-निद्रा मे चले जाते हैं और लालू जी को रेल भी चलानी है। ऎसी स्थिति मे फिल्म अभिनेता काम आते हैं। मगर वो भी कितनी देर? पहले उनके सामाजिक औसत से अधिक विवाह-विच्छेद और बाक़ी संबंध लोगो मे एक उत्सुकता जागते थे। आजकल ये सब "कहानी घर घर की' हो गया है। कतिपय धारावाहिकों ने इन सबका इतना दिखा दिया कि आजकल ऐसी स्थितियाँ किसी को असाधारण नही लगती...इसीलिये ये अब खबरों के दायरे से बाहर हो गया है।

तो अब क्या बचा....मरते किसान और इस प्रकार कि अन्य दुर्घटनाएं तो हाशिये से बाहर ही नही आ पायी, खबर तो दूर की बात है। हाँ, दुर्घटना अगर किसी बलात्कार से जुडी हो, उसके लिए कुछ उम्मीद की जा सकती है। यदा-कदा सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष मे जाकर और फिर सकुशल लौटकर कुछ दिनों कि खबरों का जुगाड़ कर लेटी हैं। मगर चौबीस घंटे चलते रहने वाले न्यूज़ चैनल की ज़रूरत के सामने ये सब ऊँट के मुँह मे जीरा है।

इतना तो स्पष्ट हो गया की खबरें कम हैं और उनकी माँग ज़्यादा.

क्रमशः...........

Saturday, September 8, 2007

मेरी बिटिया की लोरी

नींद पेड के पत्ते
पत्तों पर एक चिड़िया
चिड़िया गाना गायेगी
तो सो जायेगी गुडिया

नींद का उड़ता घोडा
टक-बक करता आये
गुडिया बैठेगी उसपर
वो बादल सा उड़ जाये

पानी - पहाड़ के ऊपर
उड़ता उड़ता जाएगा
इन्द्रधनुष के कोने में
परीलोक तब आयेगा

परीलोक की मछली
चश्मा पहन के उड़ती
शेर और बकरी दोस्त हुये
उनकी शकल भी मिलती

रँग-बिरंगी परियाँ
लगती प्यारी-प्यारी
कुछ हैं दुबली-पतली
कुछ थोड़ी सी भारी

गुडिया रानी को लेकर
घोडा वहाँ जो आये
परियाँ नाचेंगी झम-झम
और हाथी गाना गाये

पिकनिक होगी दिन भर की
खेलेंगे सब मिलकर
खाना पीना शोर मचाना
करना है जी भर कर

ऐसा सपना देखो
मेरी गुडिया रानी
सपनों में भी तेरे
आंखों में ना हो पानी

Monday, September 3, 2007

पल को अपनाओ

वक़्त के पिंजरे में क़ैद
कुछ दिन , महीने, साल
पुराने हैं बदरंग
नए कुछ बेहाल
बस ये एक पल है बाहर
आओ, इसी से प्यार कर लें
अपनी यादें भर इसमे
इसको ही अपना कर लें

ये पल एक पुल है
एक सीमाहीन अँधेरे से
एक खत्म ना होने वाली चुप्पी तक
बिछा हुआ है
रोशनी के नन्हे से तार पर
तन के खिंचा हुआ है
ये पल चुप्पी से पहले की हूक है
कविता है , कवि भी
फिर भी कितना मूक है
आओ, इसी को अपनी आवाज़ कर लें
अपनी यादें भर इसमे
इसको ही अपना कर लें