हर आह में दर्द का ये सबब क्या है
हर रंजिश वो सुनें ये ज़रूरी तो नही
पर आँखों में ये कतरा संभलता क्यों नही
खुशी भी अब रवायत सी हो गयी शायद
वरना बहार आने पर जी मचलता क्यों नही
पिंजरों के भी जज़्बात होते हैं
वो भी परिंदों के लिए रोते हैं
बस परिंदों के शोर में कहीं
अपनी दबी आवाज़ खो देते हैं
किसी का आशियाँ कहला सकें
इसलिए कितना जतन करते हैं
पर परिंदे हैं कि हर वक़्त उसे
अपना कहने से मुकरते हैं
कभी कभी हताश गुस्से में
शिकायत भी करते होंगे
फिर अपनी शिकायतों का क़र्ज़
अपने ही दर्द से भरते होंगे
हर जतन करते हैं ये
कभी हँसते, कभी रोते, कभी जिंदगी के गीत गाते हैं
अब कैसे समझाऊँ मैं इनको
ये क्यों कभी आसमान नही बन पाते हैं
कभी धर्म ,कभी समाज, कभी देश
कभी और कुछ नही
तो सिर्फ भाषा या वेश
जिसने भी दी कोई पहचान
मैं समझता था उसका अहसान
पर बाद मे ये भेद जाना
उनकी प्रखर बुद्धि को पहचाना
आसान किश्तों के लोन की तरह
ये पहचान की एक मुश्त रकम देते हैं
आपको पता भी नही चलता
कब आत्मा को गिरवी रख लेते हैं
अब वो रीति-नीति के नये प्रलोभन फेंकते हैं
उनमे हँसते और फँसते हुये हम
दुनिया अब दूसरे के चश्मे से देखते हैं
कई बार मन ये भी करता है
के चलते रहे
बिना रुके, बिना मुडे
और पहुँच जाएँ वहाँ
जहाँ ये धरती चुपके से सूरज को निगल जाती है
पर वो जगह बस नज़र आती है
हर बार पास आने पर
जाने क्यों क़दमों की गिरफ्त से फिसल जाती है
मैं हैरान होता हूँ
ये मानों किसी मनचले सपने सी हो गयी
पास, दूर और फिर पास लगना
मिलके हँसना
हँसकर बिछडना
धरती भी मेरे अपनों सी हो गयी
दिन बीता, रात गयी, फिर नया दिन
कई दिनों से नीँद के इँतज़ार मे बैठी आँखें
आख़िर आज थककर सो गयीं
ख़्वाबों की टिमटिमाती दुनिया में
ये धधकती धडकती दुनिया खो गयी....
इस मखमली अँधेरे लम्हे से पहले
आखिरी बारकुछ साये से आये थे नज़र
जैसे कुछ बीते मौसम, कुछ साल, कुछ महीने
कुछ कहना भूल गये थे ताबा
लौटकर वही बताने आये थे
ठिठके, मुडे, रूके
सोचा, मुडे, चले
जो कहा नही तब भी
बताया नही अब भी
मगर उनके इसी ठिठकने मे पता चला
इन आँखों को
अब उनको भी खोने का सफर करना है
इन बीते वक़्त के टुकडो को लेकर साथ
किसी खाली ख्वाब को भरना है
बस फर्क सिर्फ इतना होगा
खाली से ख्वाब हक़ीक़त होंगे
भरी सी हक़ीक़त सपना होगा
...आगे
"संगच्छध्वं संवंदध्वं संवौ मनांसि जानताम् ॥ "
हम साथ चलें , साथ बोलें और एक दूसरे के मन को समझे
शक्तिनगर की छोटी-बड़ी सुंदर चीज़ें देखते हुए समय बीत रहा था। इस जगह रहते हुए कई नए लोगो से मुलाक़ात हुयी, पहचान बढी और वो हमेशा के लिए यादों में घर कर गए। किसका नाम लूँ और किसे छोडूं.....सभी अपने आप में अनोखे थे। सबसे पहले हमारा हॉस्टल...जहाँ बेलाग बेपरवाह कुछ प्रशिक्षु रहते थे (हम भी उन्ही में थे)। सब अपने घर परिवारों से दूर इस जगह पर थे और कुछ दिनों के बाद वो ही एक दूसरे का परिवार बन जाते थे। कई बार लगता है की परिवार की सीमा केवल संबंधो पर ख़त्म नही होती... बल्कि वो सिर्फ़ पहला दायरा है। हम इस दायरे को फैलाते हैं ताकि एकाकीपन के कलंक से बचे रहे। खैर...तो ये प्रशिक्षु दिन में प्रशिक्षको की खामियां देखने में लगे रहते और शाम को क्लब में आने वाली सुंदरियों के गुन देखने में। रात में हॉस्टल में २९ की बाजी होती थी। जिन्हें ताश का ये खेल आता है , वो जानते हैं की ६ लाल या ६ काले खुलने में रात बीत जाती पर मुए पत्ते हैं जो खुलते ही नही। एक दूसरे की टांग खींचते हुए, लड़ते हुए, मेस के खाने को धिक्कारते हुए, घुमते और झूमते हुए कुछ अजनबी से लोगों ने ६ माह गुजारे और उस बियाबान के बीच अपना शहर बसा लिया और ६ माह बाद शहर से नए सिरे से उखड रहा हूँ। पहले सोचता था की मेरा मन शहर में बसता है पर नही...शहर शायद मन में बसता है।
यहाँ पर एक नए साहब आए थे। संयोगवश ये साहब हमारे ही विभाग में थे। नाम के लिए इनके पास कई डिग्री थी पर उनकी असलियत का भान हमें बाद में हुआ। एक दिन सुबह सुबह ये श्रीमान अपने सुपुत्र (सभ्यता की खातिर ही सही) को लेकर हमारे कमरे में और हमें आदेशात्मक लहजे में अनुरोध किया कि हम उनके सुपुत्र को क्लास ११ की गणित पढा दें। अब हमने स्वयं ही गणित काफ़ी तिकड़म लड़ा कर पास की थी....तो अपने ज्ञानी इमेज की इस तरह पोल कैसे खुलने देते? सो हमने उन्हें बताया कि हमने तो अर्थशास्त्र में स्नातक किया है अर्थात कला स्नातक हैं और हमारे देश में सभी जानते हैं कि कला स्नातक होना आपकी हीन और न्यून बौद्धिक क्षमता का परिचय है। सो उन्होंने हमारे हाथों में अपने सुपुत्र की बागडोर देना उचित नही समझा और हमें भी मुक्ति मिली। पर झूठ के पाँव नही होते.....कमबख्त इसीलिए भाग नही सकता और पकडा जाता है। एक दिन वहाँ के लोकल इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय में पत्राचार छात्रों को अर्थशास्त्र पढा रहे थे। इससे पहले कि आप कोई ग़लत धारणा बना लें...याद करवा दूँ की अन्धो में मोतियाबिन्द वाला राजा। बोर्ड पर एक समाकलन गणित का सवाल कस रहे थे और इतने में वही साहब पधार गए। उनकी कई डिग्रियों का ही परिणाम था कि वो इसे गणित के रूप में पहचान नही पाये वरना प्रशिक्षण पास करना कठिन हो जाता।
शक्तिनगर में एक और चीज़ दिखी। वहाँ पर आते-जाते लोग मिलते तो उनके पास आपकी तरफ़ देखकर मुस्कुराने का समय होता था। अक्सर दो घडी रूककर आपका हाल पूछने का भी समय निकाल लेते थे। शहरी मन के लिए समय का ये अपव्यय बड़ी विडम्बना है पर हर अपव्यय की तरह...ये मन को बहुत सुख देता है। आजकल के आधुनिक युग में जहाँ किसी रेस्तरां में खिलाना आतिथ्य की पराकाष्ठा है वहाँ पर ये लोग अब भी घर पर बुलाते थे। बेचारे कुंवारे प्रशिक्षुओं पर दया करते हुए अक्सर छुट्टी के दिन कोई सीनियर अपने घर पर बुलाकर दावत देते थे और हॉस्टल में रहे हुए सभी प्राणी जानते हैं कि ऐसी दावतों को ठुकराना घोर मूर्खता है और हम कभी भी इस मूर्खता से ग्रसित नही हुए।
इस छोटी सी जगह पर रहते हुए देखा कि ये बड़ी समस्याओं का समाधान कैसे करते हैं? भूख कि समस्या का समाधान है रोज़ मौत से जूझना। कोयला खदानों में होते धमाको से बचते हुए कोयला बीनने की कोशिश, जो बाज़ार में बेचकर रोटी का जुगाड़ कर सके। ज़ख्मी या बीमार होने पर कंपनी हॉस्पिटल में दया पाने की कातर प्रार्थना। शाम को आने वाली एक ट्रेन के इन्तेज़ार में सुबह से रिक्शा लेकर खड़े रहना। इन सबके बीच नज़र भर कर रिहंद बाँध में डूबे हुए अपने उस पुराने गाँव कि दिशा में ताकना जैसे वोह गाँव फिर उभर आयेगा। ऊँचे उठे ताप बिजली घर के चिमनियों के धुँए में किसी सपने को तलाशना। कालोनी के कूडे से बीनी हुयी प्लास्टिक कि पन्नियों से झोंपडे कि छत को टपकने से बचाना। आँखों के नीचे बढ़ती लकीरों कि जुबानी पता चलता है कि वहाँ कितने आंसू चले होंगे।
इस ६ माह के दायरे में शक्तिनगर ने बहुत कुछ सिखाया। इस बिजली घर को देखकर शहरी मन अपने विद्युत् आलोकित शहर की कीमत समझता है.....सच है...शहरी मन भी बदलता है।
ॐ सहनानववतु सहनौ भुनक्तु सहवीर्य करवावहैः। तेजस्विना वधीतमस्तु मा विद्विषा वैः ।
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः
इस कंपनी ने जब २५ साल पूरे किए तो प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता निर्देशक श्री श्याम बेनेगल को एक फ़िल्म बनाने के लिए कहा गया और उन्होंने भी अपनी रिसर्च के बाद मोती के चरित्र को फ़िल्म में ढाला और मोती का अभिनय किया प्रसिद्द अभिनेता श्री रघुवीर यादव ने । मोती महाराज ने अपने पिता के चरित्र का अभिनय किया.
मोती अनपढ़ है...उसे अंग्रेज़ी तो नही आती। उसने एम. बी. ऐ. भी नही किया और शायद इसी वजह से इतना आगे बढ़ पाया। हमारे प्रबंधन संस्थान केवल प्रबंधक बनाते हैं...अपने पैरो पर खड़े होने वाले उद्यमी नही। केवल चेष्टा और व्यवहार से भी व्यक्ती आगे बढ़ सकता है...मोती उसी की मिसाल है। ऐसे कितने ही मोती हमारे गाँव देहात में होंगे पर हम उनको नही देखते। हमें सफलता के लिए विदेशी आयाम और प्रमाण-पत्र चाहिए। शहरी मन प्रशंसा के लिए भी विदेशी मापदंड खोजता है।
शक्तिनगर में कुछ ही हफ्ते बीते थे और मै वहाँ के जीवन से परिचित हो रहा था।
......क्रमशः
मेरे शहरी जीवन को पहली ठेस तब लगी जब मैंने शक्तिनगर स्टेशन देखा। दिल्ली महानगर में पैदा हुआ और पला बढ़ा। २ साल पांडिचेरी में बिठाये पर वो भी रुरल एरिया नही था। फिर भारत के सबसे बड़े ताप बिजली निर्माण कंपनी में नौकरी मिली तो प्रशिक्षण काल दिल्ली के पास नॉएडा में बिताया। प्रशिक्षण के दौरान आदेश मिला की ६ माह का अगला प्रशिक्षण शक्तिनगर में होगा। मेरे शहरी दिमाग में ऐसा कोई नक्शा नही था जहाँ इस नाम की कोई जगह दिखती हो। पूछने पर पता चला की बनारस के २५० की.मी.दक्षिण पूर्व में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर रिहंद बाँध के पास ये ताप बिजली घर है। ये भी पता चला की यहाँ जाने के लिए लखनऊ से ट्रेन पकड़नी होगी। खैर, टिकेट कटवाया गया और हम अपने एक साथी प्रशिक्षु के साथ लखनऊ रवाना हुए और लखनऊ से त्रिवेणी एक्सप्रेस से यात्रा आरम्भ की। एक के बाद एक स्टेशन, फिर अलाहाबाद और उसके बाद के स्टेशन के नाम भी नही सुने थे। कुछ ऐसे स्टेशन दिखे जहाँ तब भी एक ढिबरी के प्रकाश में स्टेशन मास्टर सिग्नल दिखा रहे थे। ऎसी चीज़ें तब तक मैंने केवल फ़िल्म में देखी थी.....सब कुछ थोडा अजीब सा लग रहा था।
खाना खाया, सोये और फिर जगे तो लोगो से सुना शक्तिनगर आने वाला है.....आलसी मन बोला की थोड़ी देर चादर तान कर और सो लें। अबकी बार नींद खुली तो शक्तिनगर आ चुका था। समान समेटा और हमारा साथी ट्रेन के दरवाज़े तक गया और ज़ोर से बोला....अरे दादा, हम ग़लत जगह आ गए...ट्रेन तो यार्ड में आ गई है। हडबडा के गए....देखा तो प्लेटफोर्म नदारद था। एक गुज़रते हुए आदमी से पूछा तो पता चला की यही स्टेशन है और यहाँ कोई प्लेटफोर्म नही है....सामान लेकर नीचे कूदना ही एकमात्र उपाय है। मन ही मन खूब कोसा कंपनी को...और कोई जगह नही मिली थी...अरे कम से कम लखनऊ में ही बनवा देते। पर अब क्या करते...समान सँभालते हुए एक टूटे से रिक्शे में बैठ ट्रेनिंग सेंटर पहुंचे और हमें हॉस्टल में जगह दी गयी। हॉस्टल के चौकीदार ने चाबी देते हुए बड़े इत्मीनान से कहा..."रात को निकलना नही...इहाँ बहुत सौंप बा...और बालकोनी माँ कपडा ध्यान से सुखाई...नही तो ई लंगूर कपडा लत्ता उठा के ले जाब "। उसके कहने के ढंग से लग रहा था जैसे ये कितनी नोर्मल बात है...और हमारी शहरी जान सूख कर काँटा हो रही थी। सच कहूं...अपने ऊपर बहुत तरस आ रहा था। हॉस्टल में अपने बाकी साथियों से मिले....बहुत अनमने भाव से खाना खाया और किस्मत को कोसते हुए सो गए।
हमें सुबह जल्दी जागने की बुरी आदत है, सो जाग गए। बालकनी में गए.....और पहली बार ख़ुद को इतना चुप-चाप महसूस किया। सुबह की पावन निस्तब्धता, सद्यस्नाता किसी पुजारिन सी, ओस में नहायी हुयी सुबह। पक्षियों का कूजन भी मानो उस शान्ति को बढ़ा रहा था। चारो तरफ़ हरियाली, एक छोटी सी हरी भरी पहाडी और एक निर्जन सी रेल लाइन....ये कैसी जगह थी? ऐसी सुबह में मन करता है की खूब साँस लूँ...और इस सुबह की महक को पोर पोर में क़ैद कर लूँ। अब तक जो संगीत सीखा था वो याद आ रहा था। शायद पहली बार मुझे समझ आया की प्रातः काल में भैरव राग के शुद्ध स्वर क्या जादू जागते होंगे। मेरा शहरी मन ओस में धुल चुका था और शक्तिनगर मेरी यादों में बसने के लिए तैयार था.......
.......क्रमशः
हर रात एक नयी कहानी
हर नयी कहानी में वही पुराने राजा रानी
परियों का देश, उड़ने वाला घोडा
सुंदर राजकुमारी दुष्ट जादूगर
खूब सारी हँसी में दुःख भी थोडा
बिटिया और कुछ नही मांगती
बस रोज़ एक नयी कहानी
कैसे बताऊँ उसे............
अब ये कहानी कहने का मन नही करता है
उसकी आंखों में सपने बुनने से मन डरता है
आज राजकुमारी को कोई दुष्ट जादूगर
जन्म से पहले ही सुला देता है
और अगर नही सुलाता है
तो एक डर भरा जीवन उसे अपनी और बुलाता है
डर ..... भरे शहर अकेले आने जाने का
तेजाब की तेज़ आंच में झुलस जाने का
किसी राजकुमार का सपना आँख में बसाकर
फूलों के महल को मन में बिठाकर
दहेज़ kii बलिवेदी पर मिट जाने का
राजा रानी असहाय से निष्क्रिय होकर देखेंगे
बाकी सब केवल सुहानुभूति के फूल फेकेंगे
ऐसे में एक बेटी के बाप का मन रोता है
फिर भी बिटिया की जिद है.....
वो उसे एक अच्छे राजा रानी की कहानी सुनाकर
हर रात झूठ का घूँट भरकर सोता है
तुम लिखते विप्लव के गीत
देते प्रलय को आमंत्रण
सृष्टि की गर्भ व्यथा जान
क्यों करते काल का आवाहन
क्या मोह नही है तुमको भी
इन रँगों से, इन छन्दों से
इस भ्रमर गीत के गुँजन से
मायावी शब्दों के बन्धों से
फिर क्यों इस पुलकित उपवन में
तुम दहन कामना करते हो
नव वसन्त की हरी शिरा में
पतझड़ का विष क्यों भरते हो
तुष्ट नही क्या सुख के क्षण से
चिर दुखों का पथ चुनते हो
अन्तर से लेकर मर्म तंतु
एक व्यथा कथा तुम बुनते हो
किस समाज ने, किस रीति ने
किस रूढि ने क्लान्त किया
बन चिता अनल जो दहके तुम
तो किस ज्वाला को शांत किया
हिमगिरि सा लेकर स्थिर मानस
शांत किया अस्थिर मन को
शब्दों मे भर पिघला लोहा
तुम परुष बनाते जन-जन को
ये कुलिश कुठार कठोर छन्द
हैं फिर भी स्निग्ध सरल प्राण
कवि कैसे समझूँ मन तुम्हारा
सब हार के गाये जो जय-गान
कवि अपना मन दो मुझको
मैं बन कर देखूँ दावानल
सुधा-मोह से मुक्त हो जाऊँ
मैं बनूँ काल का हालाहल
मेरे सुर मुझ जैसे ही अनगढ़ से हैं
बेलाग किसी जीवन से हैं ये निकले
सभ्य नही ये निपट निरे और अनपढ़ से हैं
किसी बसंती पवन का बनके झोंका
अमराई से लड़ जाएँ ये लगे जो मौका
जहाँ मन हो वहीं आठवाँ सुर लगाएं
बंदी रागों से दूर खड़े ये अल्हड़ से हैं
मेरे सुर मुझ जैसे ही अनगढ़ से हैं
रूठा रूठा बादल ज्यों हौले से गरजे
दोपहरी को अँधेरा कर झम-झम बरसे
तपता आँगन जानके भी जो गिरती बारिश
जिद्दी बचकानी बारिश जैसे अक्खड़ से हैं
मेरे सुर मुझ जैसे ही अनगढ़ से हैं
हरसिंगार की भीनी खुशबू भरना चाहें
अमलतास के फूलों सा ये झरना चाहें
जलकर तपकर पलाश सा साज सजायें
कोमल फूलों के बीच खिले कुछ पत्थर से हैं
मेरे सुर मुझ जैसे ही अनगढ़ से हैं
कौन?
अच्छा.... मौत
आओ दोस्त, बैठो
कुछ बात करो , कुछ कहो, कुछ सुनो,
कुछ मेरे साथ किस्से बुनो
कुछ किस्से शहरज़ाद के
जिसने तुमको बहलाने के लियेसुनायी थी
कहानियां एक हज़ार एक
और वो जो तुमने देखा होगा
जंग के मैदानो में
जिस्म की दुकानो में
शहर के वीरानों में
टूटते मकानो में
उन सबके किस्से कह सकते हो
आख़िर कब तक इन सबको सीने मे लिये रह सकते हो
जानता हूँ
तुम्हे कोई नही चाहता
तुमको कोई गले नही लगाता
कोई नज़र नही मिलता
कोई घर नही बुलाता
जो रोज़ भूख के मारे तुमसे मदद माँगता है
तुम्हारे आने पर
वो भी तुमसे दूर भागता है
तुम निराश मत होना
ये सब अभी कच्चे हैं
तुम्हारी उमर के सामने बच्चे हैं
धीरे-धीरे तुमको समझ जायेंगे
फिर तुम्हरी गोद मे सिर रखकर
हमेशा के लिये सो जायेंगे
आज बारिश हो रही है
पानी का रँग वही
आवाज़ भी
पर वैसा गीलापन नही
जो घर पर होता था
जो गिरता था थके तन पर
और मन को भिगोता था
नही......ये वो बरसात तो नही
जो मेरे शहर में आती थी
पराये शहर की बारिश
कुछ खारी होती है शायद.......