इस शब के गुज़रते ही एक शब और होगी
किस्सा चलता ही रहेगा बात अभी और होगी
मोहरों सी ये दुनिया , बिछाती है बिसात
डर ये लगता है दिल को, मात अभी और होगी
आप बावफा तो नहीं यकीन मुझको पर
क़त्ल जो आप करेंगे, वो वफ़ा और होगी
दिन के जलाने वाले मगरूर उजाले से कहो
खौफ खाओ, न जलाओ रात 'अभि' और होगी
Tuesday, January 22, 2008
Saturday, January 19, 2008
बात बढ़ती नही
जो तुम कह देते मुझे, बात बढ़ती नही
होता कुछ भरम नया, बात बढ़ती नही
बिखरते रहना मौज की आदत लेकिन
साहिल जो संभल जाता बात बढ़ती नही
आईने को उज्र नही टूटने से
अक्स खुद पिघल जाता बात बढ़ती नही
बहार से बचकर जिंदगी निकली थी
पतझड़ भी गुज़र जाता बात बढ़ती नही
"अभि" हर शह तकाज़ा करती मुझसे
वक़्त कुछ दिलदार होता बात बढ़ती नही
होता कुछ भरम नया, बात बढ़ती नही
बिखरते रहना मौज की आदत लेकिन
साहिल जो संभल जाता बात बढ़ती नही
आईने को उज्र नही टूटने से
अक्स खुद पिघल जाता बात बढ़ती नही
बहार से बचकर जिंदगी निकली थी
पतझड़ भी गुज़र जाता बात बढ़ती नही
"अभि" हर शह तकाज़ा करती मुझसे
वक़्त कुछ दिलदार होता बात बढ़ती नही
Saturday, December 29, 2007
फितरती दाग़
मेरी फितरत से नाराज़ मेरे दोस्त सुनो
मेरे रंगों के बिखरे सभी तार बुनो
कि तुमको भी कोई ख्वाब नया मिल जाये
मेरी फितरत पर लगा दाग यों ही धुल जाये
आसमाँ से भी तो पूछो ये बरसता क्यों है
आँख में बूँद लिए दिल ये तरसता क्यों है
कि तुमको भी कोई टूटा ख्वाब मिल जाये
मेरी फितरत पर लगा दाग यों ही धुल जाये
नींद के पन्ने इसलिए मैंने संभाले हैं
रात भर चलते रहे , पाँव भर छाले हैं
कि तुमको भी छालो से सना ख्वाब कोई मिल जाये
मेरी फितरत पर लगा दाग यों ही धुल जाये
बस्तियों से अपना रुख ही जिसने मोड़ लिया
रेत की उड़ती छाँव को ही खुद पे ओढ़ लिया
कि तुमको भी ख्वाब बंजारा कोई मिल जाये
मेरी फितरत पर लगा दाग यों ही धुल जाए
"ये कविता हमारे मित्र 'मस्तो' की एक टिप्पणी से प्रेरित है, इसीलिए उन्ही को समर्पित भी है"
मेरे रंगों के बिखरे सभी तार बुनो
कि तुमको भी कोई ख्वाब नया मिल जाये
मेरी फितरत पर लगा दाग यों ही धुल जाये
आसमाँ से भी तो पूछो ये बरसता क्यों है
आँख में बूँद लिए दिल ये तरसता क्यों है
कि तुमको भी कोई टूटा ख्वाब मिल जाये
मेरी फितरत पर लगा दाग यों ही धुल जाये
नींद के पन्ने इसलिए मैंने संभाले हैं
रात भर चलते रहे , पाँव भर छाले हैं
कि तुमको भी छालो से सना ख्वाब कोई मिल जाये
मेरी फितरत पर लगा दाग यों ही धुल जाये
बस्तियों से अपना रुख ही जिसने मोड़ लिया
रेत की उड़ती छाँव को ही खुद पे ओढ़ लिया
कि तुमको भी ख्वाब बंजारा कोई मिल जाये
मेरी फितरत पर लगा दाग यों ही धुल जाए
"ये कविता हमारे मित्र 'मस्तो' की एक टिप्पणी से प्रेरित है, इसीलिए उन्ही को समर्पित भी है"
Tuesday, November 27, 2007
द्वंद्व समास
एक होने का स्वप्न लिए
हमने समय से संधि की थी
पर न समय बदला
ना हम
ना तुम
एक स्वर ना हो पाए कभी
आज भी केवल जुडे हुए से
द्वंद्व के भीतर खडे हुए से
एक शब्द नही
बस समूह भर बन कर रहते हैं
शायद हमारे रिश्ते को
द्वंद्व समास कहते हैं
हमने समय से संधि की थी
पर न समय बदला
ना हम
ना तुम
एक स्वर ना हो पाए कभी
आज भी केवल जुडे हुए से
द्वंद्व के भीतर खडे हुए से
एक शब्द नही
बस समूह भर बन कर रहते हैं
शायद हमारे रिश्ते को
द्वंद्व समास कहते हैं
Wednesday, November 21, 2007
जो किया नही....
प्रिये.....
तुमने अपने लिए सुननी चाही थी
कोई सुन्दर उपमा
खेद रहा,
मैं कोई तरल सरल उपमा भी तुमको दे ना पाया
कोई गीत तुम्हारी सुन्दरता पर कह ना पाया
आषाढ़ मेघ को देख भी मैं छंद हीन था
सारे सरस स्वरों में मेरा स्वर क्षीण था
खेद रहा,
मेरे इन कटु शब्दों के कंटक पथ पर
कभी धूमिल कभी जलती सी भावो की छाया
इन धूमिल सत्यों को कविता कहते कहते
प्रेम का कोई jhootha vaadaa भी दे नही पाया
खेद रहा,
जीवन को बस झोंक दिया संग्रामो में
रक्त लुटाया औने-पौने दामो में
पर तुम्हारे लिए कभी एक गुलाब भी
ह्रदय रक्त से अपने रक्तिम कर नही पाया
खेद रहा,
मैंने सबके दुखों को पाथेय बनाकर
नीलकंठ बनने का था खेल रचाया
तुमने जो दी थी मुझको अमृत धारा
मैं बस अपना गरल ही तुमको दे पाया
प्रिये,क्षमा करो
यह कहकर तुमको लज्जित नही करूंगा
मन की ग्लानि पर कोई मरहम नही रखूंगा
आज विदाई की वेला में बस इतना संबल दो
जीवन जो आएंगे, उसमे भी होंगे ऐसे रण
पर साथ तुम्हारा हो और मेरा अटल हो प्रण
क्लिष्ट कलुष पथो पर जब भी मैं स्वयं को पाऊँ
जीवन के विष संग तुम्हारे बाँट मैं पाऊँ
तुमने अपने लिए सुननी चाही थी
कोई सुन्दर उपमा
खेद रहा,
मैं कोई तरल सरल उपमा भी तुमको दे ना पाया
कोई गीत तुम्हारी सुन्दरता पर कह ना पाया
आषाढ़ मेघ को देख भी मैं छंद हीन था
सारे सरस स्वरों में मेरा स्वर क्षीण था
खेद रहा,
मेरे इन कटु शब्दों के कंटक पथ पर
कभी धूमिल कभी जलती सी भावो की छाया
इन धूमिल सत्यों को कविता कहते कहते
प्रेम का कोई jhootha vaadaa भी दे नही पाया
खेद रहा,
जीवन को बस झोंक दिया संग्रामो में
रक्त लुटाया औने-पौने दामो में
पर तुम्हारे लिए कभी एक गुलाब भी
ह्रदय रक्त से अपने रक्तिम कर नही पाया
खेद रहा,
मैंने सबके दुखों को पाथेय बनाकर
नीलकंठ बनने का था खेल रचाया
तुमने जो दी थी मुझको अमृत धारा
मैं बस अपना गरल ही तुमको दे पाया
प्रिये,क्षमा करो
यह कहकर तुमको लज्जित नही करूंगा
मन की ग्लानि पर कोई मरहम नही रखूंगा
आज विदाई की वेला में बस इतना संबल दो
जीवन जो आएंगे, उसमे भी होंगे ऐसे रण
पर साथ तुम्हारा हो और मेरा अटल हो प्रण
क्लिष्ट कलुष पथो पर जब भी मैं स्वयं को पाऊँ
जीवन के विष संग तुम्हारे बाँट मैं पाऊँ
Monday, September 24, 2007
मेरे लिए बस दीप
अगणित तारे इन हाथों मे न संभलेंगे
मेरे लिये बस छोटा सा दीप जलाओ
नभ सा विस्तार भला क्या दे पाऊँगा
चाहो तो इस मन मे ही सँसार बसाओ
तुमको मुक्त गगन मे ही उडना प्रिय था
मै भी शाखा के ममता से मुक्त नही था
तुम उडे पर मै अब भी हूँ आस मे बैठा
थककर शायद तुम इस शाखा पर आओ
तुमको भाया है सरिता सा बहते रहना
सागर मे मिलना उसकी ही बातें कहना
मैं तट बन इस आशा के साथ चला हूँ
कुछ बातें शायद मुझसे भी करते जाओ
नव बसन्त के पुष्पों को मै तोड न पाया
इसीलिये पतझड के पत्ते ओढ मै आया
पुष्पहार तो नही पर तुम छाँव जो चाहो
इन पत्तों से ही अपना पर्ण-कुटीर बनाओ
अगणित तारे मेरे हाथों मे न संभलेंगे
मेरे लिये बस छोटा सा दीप जलाओ
मेरे लिये बस छोटा सा दीप जलाओ
नभ सा विस्तार भला क्या दे पाऊँगा
चाहो तो इस मन मे ही सँसार बसाओ
तुमको मुक्त गगन मे ही उडना प्रिय था
मै भी शाखा के ममता से मुक्त नही था
तुम उडे पर मै अब भी हूँ आस मे बैठा
थककर शायद तुम इस शाखा पर आओ
तुमको भाया है सरिता सा बहते रहना
सागर मे मिलना उसकी ही बातें कहना
मैं तट बन इस आशा के साथ चला हूँ
कुछ बातें शायद मुझसे भी करते जाओ
नव बसन्त के पुष्पों को मै तोड न पाया
इसीलिये पतझड के पत्ते ओढ मै आया
पुष्पहार तो नही पर तुम छाँव जो चाहो
इन पत्तों से ही अपना पर्ण-कुटीर बनाओ
अगणित तारे मेरे हाथों मे न संभलेंगे
मेरे लिये बस छोटा सा दीप जलाओ
Sunday, September 23, 2007
ज़िन्दगी कि रेल
स्टेशन के बाहर खडा भिखारी
खोमचेवाला, कुली, मदारी
रिक्शे वाला भैया या गुमटी वाला पनवाडी
सब देखते हैं सपने
कि एक दिन उनकी गाडी पटरी पर आयेगी
फिर राजधानी की स्पीड से
उनको आगे ले जायेगी
और उस राजधानी कि उम्मीद में
रोज़ लोकल की भीड सा घिसते हैं
जीवन की पटरियों कि फिश-प्लेट मे फँसे
चुपचाप खडे पिसते हैं
प्लेटफार्म सा अपनापन
ये भी दिखलाते हैं
तभी तो हर आने-जाने वाले को
कभी चाचा, कभी भैया, कभी अम्मा बनाते हैं
बुलाते हैं ,दिखाते हैं
कराहते हैं ,सराहते हैं
कभी टहलाते कभी बनाते हैं...
फिर चुप हो जाते हैं
क्योंकि अगला किसी रिश्ते से मुकर जाता है
सामान नही लाता
पान नही खाता
आधे दाम वाली इम्पोर्टेड शर्ट पर नही ललचाता
तमाशा नही देखतापैसा नही फेंकता
रिक्शे से मुँह चुराकर
पैदल ही चला जाता है
ऐसे अर्थहीन रिश्ते को कौन भला निभाता है
ये भी नही निभाते हैं
आँख से ओझल और पुकार के बाहर चले बाने पर
कुछ किस्मत की तरह
एक भद्दी सी गाली से मन भरकर
किसी और पुख्ता रिश्ते की खोज मे लग जाते हैं
रात होती है
पनवाडी कि ढिबरी जलती है
कुली , खोमचेवाला, मदारी
रिक्शेवाला भैया और भिखारी
सब थककर सोने जाते हैं
और रात की पाली के कुली मदारी
खोमचेवाला, रिक्शेवाला और भिखारी आकर
अपनी राजधानी के सपने सजाते हैं
वो भी रिश्ते सजाते हैं
अऊटर सिग्नल पर खडी ज़िन्दगी के लिये
प्लेटफार्म पर अपनी पलकें बिछाते हैं
खोमचेवाला, कुली, मदारी
रिक्शे वाला भैया या गुमटी वाला पनवाडी
सब देखते हैं सपने
कि एक दिन उनकी गाडी पटरी पर आयेगी
फिर राजधानी की स्पीड से
उनको आगे ले जायेगी
और उस राजधानी कि उम्मीद में
रोज़ लोकल की भीड सा घिसते हैं
जीवन की पटरियों कि फिश-प्लेट मे फँसे
चुपचाप खडे पिसते हैं
प्लेटफार्म सा अपनापन
ये भी दिखलाते हैं
तभी तो हर आने-जाने वाले को
कभी चाचा, कभी भैया, कभी अम्मा बनाते हैं
बुलाते हैं ,दिखाते हैं
कराहते हैं ,सराहते हैं
कभी टहलाते कभी बनाते हैं...
फिर चुप हो जाते हैं
क्योंकि अगला किसी रिश्ते से मुकर जाता है
सामान नही लाता
पान नही खाता
आधे दाम वाली इम्पोर्टेड शर्ट पर नही ललचाता
तमाशा नही देखतापैसा नही फेंकता
रिक्शे से मुँह चुराकर
पैदल ही चला जाता है
ऐसे अर्थहीन रिश्ते को कौन भला निभाता है
ये भी नही निभाते हैं
आँख से ओझल और पुकार के बाहर चले बाने पर
कुछ किस्मत की तरह
एक भद्दी सी गाली से मन भरकर
किसी और पुख्ता रिश्ते की खोज मे लग जाते हैं
रात होती है
पनवाडी कि ढिबरी जलती है
कुली , खोमचेवाला, मदारी
रिक्शेवाला भैया और भिखारी
सब थककर सोने जाते हैं
और रात की पाली के कुली मदारी
खोमचेवाला, रिक्शेवाला और भिखारी आकर
अपनी राजधानी के सपने सजाते हैं
वो भी रिश्ते सजाते हैं
अऊटर सिग्नल पर खडी ज़िन्दगी के लिये
प्लेटफार्म पर अपनी पलकें बिछाते हैं
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