Tuesday, May 6, 2008

दर्द

दर्द....किसी शाम के धुंधलके सा,

उतर आता है आँगन में

ओढा देता है मुझको एक चादर कंपकंपाती सी

सिहर जाता है मेरे बदन में कोई शिकायत बनकर

आवाज़ जैसे कोई बीती सी, थरथराती सी

दर्द....किसी शाम के धुंधलके सा,
उतर आता है आँगन में

नसों में अपनी रूह ये भर देता है

एक-एक कर यादो के चिराग करता रोशन

अँधेरा हर कोने में कर देता है

दर्द....किसी शाम के धुंधलके सा,

उतर आता है आँगन में

एक खारे पानी की बूँद में समेट लेता है ज्वार

उठती-गिरती साँसों में भिगोता हुआ

ना जाने कब होने लगता है इससे प्यार

दर्द....किसी शाम के धुंधलके सा,

उतर आता है आँगन में

Saturday, May 3, 2008

ये सोचो....

ये सोचो...

पुरानी बातें यादों का तकाजा करें

बीते कोहरे गुम होने की इजाज़त चाहें

कोई ढलता लम्हा थाम ले हाथ

माँग ले तुमसे थोडा और साथ

तो क्या हाथ झटक आगे बढ़ पाओगे

या फिर बीती बातों को याद कर

फिर से चुप रह जाओगे

ये सोचो....

अगर कोई राह तुमसे छाँव माँग ले

या धूप माँगे सुकून की कीमत

कोई मील का पत्थर

कहे तुमसे ये बढ़कर

मुझे भी किसी मंजिल का पता देते जाओ

तो क्या ये सब तुम दे पाओगे

या किसी भूले हुए रास्ते सा

समय की धूल से ढक जाओगे

ये सोचो...

कोई नया तारा कहे गर तुमसे

मेरा नया चाँद बनो

नयी सी उजली धुली रात बनो

कोई नया किस्सा नयी बात बनो

क्या तुम कोई रोशनी दे पाओगे

या किसी पिघलते चाँद की तरह

किसी अमावस में सो जाओगे

Monday, April 28, 2008

मैं अब भी दूर नही...

जो गीत कहा था गाने को
मन ही मन बस गा पाया
खामोशी के बोल लिए
बेबाक सुरों ने जो गाया
वो गीत अगर तुम सुन पाये
या बाँध के गर तुम रख पाये
इस मन के पिंजड़े मे ही कहीं
तब यही समझना दोस्त मेरे
मैं अब भी तुमसे दूर नही

गाते गाते जो एक हुआ
हम दोनों के प्राणों से
अंतर्मन में उतर गया
डूबा था जो इन भावों में
उसकी बिखरी कलियों में गुम
महका करते अब तक तुम
जैसे निशिगंधा खिले कहीं
तब यही समझना दोस्त मेरे
मैं अब भी तुमसे दूर नही


गुलमोहर से लेकर अग्नि
फागुन का रँग लगाया था
बेलाग गीत के रँगों से
एक बीता पन्ना सजाया था
याद आती है वो छुपी किताब
और उसमे सहेजा एक गुलाब
जो दिया था मैंने तुमको कभी
तब यही समझना दोस्त मेरे
मैं अब भी तुमसे दूर नही


ये अपनी ही एक पुरानी बांगला कविता का अनुवाद किया है। इस अनुवाद में हमारे मित्र श्री पीयूष नें बहुत मदद की है, जिसके लिए उनका बहुत बहुत धन्यवाद ।











Saturday, April 5, 2008

दरिया को पार किया जाये

आओ के इस दरिया को फिर पार किया जाए

मौजों के रहम पे खुदी को रख दिया जाये

सपनों से बाँध ले अब gharonde को apne

रेत जो behtii है तो bahne दिया जाये

ख्वाहिशें हसीन हैं पर रुख को ज़रा मोड़

हकीकतों के आँधी से अब लड़ लिया जाये

साहिलों के छूटने का शिकवा न हो कहीं

कश्तियों के दिल को सख्त कर लिया जाये

Tuesday, April 1, 2008

कुछ नया सा...

नया सा कुछ लिखूँ ये चाह लिए
मैं भटकता रहा यादों के चिराग लिए
किसी मोड़ पे मिले कोई नई छाँव
कोई मील का पत्थर रोक ले मेरे पाँव
मुझको कोई शाम नया रँग दिखलाये
मेरी कलम मे रोशनाई नई भर जाए


लफ्जों के अम्बार मैंने टटोले हैं
बंद किवाड़ भी चुपके से कई खोले हैं
किसी पुराने लिफाफे में लिपटा हुआ
अनजान किसी खुशबू मे सिमटा हुआ
कोई नई बात ये लफ्ज़ मुझे कह जाए
मेरी कलम मे रोशनाई नई भर जाए


कोई साहिल मिले जो मौज से टूटा हो
कोई लम्हा जो कहीं वक्त से छूटा हो
किसी बिखरे से पल मे हो संजोया सा
दिखता हो हमेशा पर रहे खोया सा
ऐसे ख्याल से कोई मुझको मिल्वाये
मेरी कलम मे रोशनाई नई भर जाए

Monday, March 17, 2008

कहानी ऐसी होंगी

किताब यों ही अधखुली तो नही

कुछ तो मौजू में तकलीफ होगी

जो हाशिये से झाँक रहे मायने

उनमें भी कहानी एक रहती होगी

जो इस पार के सफों से शुरू होकर

उस पार के किसी पन्ने मी गुम हुयी

किसी स्याही के पिघले आँसू को थाम

कहानी किसी मुकाम पे ठहरती होगी

किताब के पहले पन्ने सी सफ़ेद

जहाँ कोई इबारत नही करती सवाल

उस कोरेपन के दिल में छुपते हुए

कहानी इन लफ्जों को सहती होंगी

कोई मरकज़ कोई साहिल ये किताब मेरी

इसकी आगोश में कई लम्हे जवान

इन्ही लम्हों की रवानी ओढे

कहानी भी नयी सी रहती होंगी

"ये कविता हमारे मित्र कुनाल जी से प्रेरित और उन्ही को समर्पित है."

Tuesday, March 4, 2008

कुछ कह जाए मुझे.......

हर उठती लहर नया मंज़र दिखलाये मुझे

बिखरने का नया अंदाज़ ये सिखलाये मुझे

मैंने देखा है इस दर्द को कई बार रोते हुए

कोई इस दर्द के छुपे दर्द से मिलवाये मुझे

तमन्नाओं का चाँद रात से जब डरता हो

रोशनी के मायने तब कोई समझाए मुझे

माजी को बिसारा 'अभी' किसी लोरी की तरह

उस लोरी के आँचल में कोई छुपा जाए मुझे