दर्द....किसी शाम के धुंधलके सा,
उतर आता है आँगन में
ओढा देता है मुझको एक चादर कंपकंपाती सी
सिहर जाता है मेरे बदन में कोई शिकायत बनकर
आवाज़ जैसे कोई बीती सी, थरथराती सी
दर्द....किसी शाम के धुंधलके सा,
उतर आता है आँगन में
नसों में अपनी रूह ये भर देता है
एक-एक कर यादो के चिराग करता रोशन
अँधेरा हर कोने में कर देता है
दर्द....किसी शाम के धुंधलके सा,
उतर आता है आँगन में
एक खारे पानी की बूँद में समेट लेता है ज्वार
उठती-गिरती साँसों में भिगोता हुआ
ना जाने कब होने लगता है इससे प्यार
दर्द....किसी शाम के धुंधलके सा,
उतर आता है आँगन में